“आनन्द” स्त्रोत बह रहा पर तू उदास है।
“आनन्द” स्त्रोत बह
रहा पर तू उदास है।
अचरज है जल में रहकर
भी मछली को प्यास है ।
फूलों में ज्यों सुवास है
ईख में मिठास है।
भगवान् का त्यों विश्व के
कण-कण में वास है ॥
टुक ज्ञानचक्षु खोलकर
तू देख तो सही।
जिसको तू ढूँढ़ता है
वह सदा तेरे पास है ॥
कुछ तो समय निकाल
आत्म-शुद्धि के लिए।
नर जन्म का उदेश्य न
केवल विलास है ॥
आनन्द मोक्ष का न
पा सकेगा तब तलक ।
तू जब तलक ‘प्रकाश’
इन्द्रियों का दास है ॥










