आजादी की आशा में क्यों बैठे अक्ल को

0
8

आजादी की आशा में क्यों बैठे अक्ल को

आजादी की आशा में
क्यों बैठे गंवा अक्ल को
यह बल वालों की आजादी
नहीं दीखेगी निर्बल को।। टेक।।
कमजोरों को दुनिया में
आजादी कभी रहीं ना
छांव में सर्दी अधिक
सतावे धूप में चले पसीना


कमजोरों का दुनिया में
ना खाना है न पीना
न कहीं आदर हो निर्बल का
बेकारी का जीना
गर्दिश के चक्कर में
निशदिन काट रहा पलपल को ।।1।।

निर्बल जन जब सफर
करन को स्टेशन पर जावें
रेल में भारी भीड़ देखकर
खड़े-खड़े चकरावें
डिब्बे में चढ़ने के लिये
खिड़की पै जोर लगावें


यहां जगह नहीं यहां
जगह नहीं अन्दर सब चिल्लावें
गाड़ी चली गई खड़ा रह गया
यही हाल हुआ कल को।।2।।

आपत्ति जिस साल वतन में
घिर-घिर करके आवे
सबसे पहले कमजोरों को
आकर त्रास दिखावे
बलवानों से बीमारी भी


दूर खड़ी थर्रावे सब
दुखों की खान जगत में
कमजोरी ही पावे
कमजोरों की दुनिया में ना
पूछे कोई कुशल को ।।3।।

तुम घर में बड़कर सिर को
पकड़कर आजादी की
आस करो आजादी की
इच्छा है तो कमजोरी का
नाश करो हिम्मत हार बैठकर


घर में मतना चित्त उदास करो
अज्ञान अविद्या दुखों का कारण,
विद्या का प्रकाश करो प्रेमी धीरज धार,
पार करो वीरो इस दलदल को।।4।।