अजब हैरान हूँ भगवन्

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अजब हैरान हूँ भगवन्

अजब हैरान हूँ भगवन्,
तुम्हें क्यों कर रिझाऊँ मैं

अजब हैरान हूँ भगवन्,
तुम्हें क्यों कर रिझाऊँ मैं

कोई वस्तु नहीं ऐसी
जिसे सेवा में लाऊँ मैं
अजब हैरान हूँ भगवन्,
तुम्हें क्यों कर रिझाऊँ मैं

तुम्हीं हो मूर्ति में भी,
तुम्हीं हो व्याप फूलों में,
भला भगवान् पर भगवान्
को क्यों कर चढ़ाऊँ मैं
अजब हैरान हूँ भगवन्,
तुम्हें क्यों कर रिझाऊँ मैं

तुम्हारी ज्योति से रोशन
हैं सूरज चाँद और तारे,
तुम्हीं कह दो भला कैसे
तुम्हें दीपक दिखाऊँ मैं
अजब हैरान हूँ भगवन्,
तुम्हें क्यों कर रिझाऊँ मैं

तुम्हीं हो व्याप्त कण कण में
तुम्हीं बसते हो तन मन में
तो फिर ढूँढूँ कहाँ तुमको
कहाँ मस्तक झुकाऊँ मैं
अजब हैरान हूँ भगवन्,
तुम्हें क्यों कर रिझाऊँ मैं

कोई वस्तु नहीं ऐसी
जिसे सेवा में लाऊँ मैं
अजब हैरान हूँ भगवन्,
तुम्हें क्यों कर रिझाऊँ मैं

बड़े नादान हैं वे जन
जो घड़ते आपकी मूरत
बनाता है जो सब जग को
उसे क्यों कर बनाऊँ मैं

भुजायें हैं, न गर्दन है,
न सीना है न पेशानी,
तुम हो निर्लेप – “नारायण”,
कहाँ चन्दन लगाऊँ मैं

पुकारूँ कहाँ कहाँ पर मैं
तुम तो कण कण में बसते हो
निरादर है बुलाने में ,
अगर घण्टी बजाऊँ मैं

लगाना भोग कुछ तुमको,
तेरा अपमान करना है,
खिलाता है जो खुद जग को,
उसे कैसे खिलाऊँ मैं