यद्दीळाविन्द्र यत्स्थिरे यत्पशनिपराभृतम्। वसु स्पार्ह तदा भर।।
साम. २०७, १०६७, अथ २०.४३.२
तर्जः मळविलिन नरगिन्दे मुखमुन्नु काणा
परमैश्वर्यवाले इन्द्र तुम्हारा, ऐश्वर्य कितना महान है! (2)
इच्छा है मुझको भी ऐसे ऐश्वर्यों की रसमय जो अमृत के समान है,
शम दम उपरति श्रद्धा तितिक्षा समाधान जिसका परिणाम है
दृढ़-वीर पुरुषों में है जो निरन्तर, हे इन्द्र! तेरा ही वरदान है।
परमैश्वर्य वाले…
(1) संसार के धनियों को देखकर प्रभु मुझको आकर्षण तो होता नहीं
अदम्य उत्साह दृढ़ता-बलवाला ही करता है मोहित, जो ऋतवान है।
परमैश्वर्य वाले…
(2) ऐसे विजयशील गुणवानों को देख, जागती है मुझमें श्रद्धा प्रचूर
हे इन्द्र! ऐसा ही ऐश्वर्य दे मुझको सार्थक जीवन का ही अरमान है।।
परमैश्वर्य वाले…
(अदम्य) प्रबल, अजेय। (ऋतवान) नियमों का पालन करने वाला। (प्रचूर) अत्यधिक।
(शम) अपनी आत्मा और अन्तःकरण का धर्माचरण में प्रवृत्त कराना। (दम) कर्मेन्द्रियों
को व्याभिचार आदि कर्मों से बचाकर जितेन्द्रिय बनाकर शुभ कर्मों में लगाना। (उपरति)
दुष्ट कर्मों वाले मनुष्यों से सदा दूर रहना। (श्रद्धा) वेदादि सत्य शास्त्रों और उनके बोध से पूर्ण
आप्त विद्वानों सत्य उपदेष्टा ओं के सत्य नियमों का मानना। (तितिक्षा) चाहे निन्दा स्तुति लाभ
हानि क्यों न हो किन्तु हर्ष शोक छोड़ मुक्ति साधनों में लगे रहना। (समाधान) चित्त की एकाग्रता।










