ए ऋषि याद आए ज़माना तेरा ।

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ए ऋषि याद आए ज़माना तेरा ।

तर्ज – साथिया नहीं जाना के जी न लगे

ए ऋषि याद आए ज़माना तेरा ।
सारे जग ने जाना फसाना तेरा।।
ए ऋषि याद…..

हवा प्रतिकूल थी, नहीं अनुकूल थी।
समझा न जग तुमको बड़ी भारी भूल थी।
ऐसे समय में जगाना तेरा ।।
ए ऋषि याद……

चले छोड़ बस्ती को, तज बुत परस्ती को।
ठुकराया उदयपुर में, लाखों की हस्ती को।
त्याग भरे जीवन का फसाना तेरा।।
ए ऋषि याद……

आधियारी रात में, कोई न था साथ में।
पाखण्ड़ खण्ड़नी थी, वेद थे हाथ में।
निराकार प्रभु को सच बताना तेरा।।
ए ऋषि याद…..

कार्तिक का महीना था, अभी और जीना था।
अपनों ने जहर दिया, वो भी तुझे पीना था।
’याद’ जहर पीकर मुस्कराना तेरा ।।
ए ऋषि याद…..