ए रहबरे मुल्को कौम जरा
ए रहबरे मुल्को कौम जरा
आँखें तो उठा नजरें तो मिला।
कुछ हम भी सुने हमको भी
बता ये किसका लहू है कौन मरा॥
धरती की सुलगती छाती के
बेचैन शरारे पूछते हैं।
तुम लोग जिन्हें अपना न
सके वो खून के धारे पूछते हैं
ये किसका लहू है कौन मरा,
ए रहबरे मुल्को कौम जरा ॥1॥
वो कौन सा जज्बा था जिससे
फर्मूदा निजामे जिस्त हिला।
झुलसे हुए वीरां गुलशन में
इक आस उम्मीद का फूल खिला॥
जनता का लहू फौजों से मिला
फौजों का लहू जनता से मिला।
ये किसका जुनूं है कौन मरा,
ए रहबरे मुल्को कौम जरा॥2॥
क्या कौमो वतन की जय
गाकर मरते हुए राही गुण्डे थे।
जो देश का परचम लेके उठे
वो शाख सिपाही गुण्डे थे॥
जो बारे गुलामी सह न सके
वो मुजरिम शाही गुण्डे थे।
ये किसका लहू है कौन मरा,
ए रहबरे मुल्को कौम जरा॥3॥
तुम समझौते की आस में
हो हम आगे बढ़ते जायेंगे।
हम ठान चुके हैं जब जी में
हर मंजिल से टकरायेंगे।॥
हम मंजिले आजादी की
कसम हर मंजिल पर दोहरायेंगे।॥
ये किसका लहू है कौन मरा,
ए रहबरे मुल्को कौम जरा॥4॥










