ऐ मेरे ऋषिवर, तू है महान, तेरा पैगाम,
याद करे सारा जहान
आए ऋषि दयानन्द शिक्षा अपार लेके
जागृत किया था जग को वेदों का सार लेके ॥ जागृत ॥
गौओं की आँखों रोई, लाखों ही सर
कटाए विधवा सती अनाथों पर लाखों जुल्म ढाए
दुःख दर्द को मिटाने ऋषि आया प्यार लेके ॥ जागृत ॥
फैले थे मत मतान्तर कोई न वेद जाने
मक्कार और फरेबी, जग को लगे डराने
निकला ऋषि अकेला, कष्टों का भार लेके ॥ जागृत ॥
आयों ज़रा बता दो संदेश उस ऋषि का
यूँ व्यर्थ ना कभी हो बलिदान उस व्रती का
अज्ञान भ्रम मिटा दो सत्यार्थ प्रकाश लेके ॥ जागृत ॥










