ऐ मेरे मन! अमर ज्योति है तेरे सन्सार में
ऐ मेरे मन!
अमर ज्योति है तेरे सन्सार में
ज्योतियों के ही सहारे
ला सङ्कल्प विचार में
सात्विक तेरे सन्सार में
ऐ मेरे मन !
आग से चिंगारी लेकर
बन जा ज्वाला तू स्वयं
ज्ञान कर्म व धारणा
ध्यान समाधि धार ले
सात्विक तेरे सन्सार में
ऐ मेरे मन!
वीर, कवच तो पहन ले
पर बल भुजाओं में ना हो
रणस्थली क्या काम की फिर
रक्षा की रफ्तार में
सात्विक तेरे सन्सार में
ऐ मेरे मन !
ना झिझकता वीर कभी
निर्माण ना ही विनाश से
दृढ़ प्रतिज्ञ ऐ मेरे मन!
बह विजय बल-धार में
सात्विक तेरे सन्सार में
ऐ मेरे मन !
वीर्य-कवच की शक्ति वीर की
ज्वाला सम मूछों में है
लपकती है आग के सम
वीरों के रणागार में
सात्विक तेरे सन्सार में
ऐ मेरे मन !
विघ्न बाधा को हटा दे
यज्ञ के उपचार से
उपकरण तो यज्ञ ना है
यज्ञ उठे उपकार से
सात्विक तेरे सन्सार में
ऐ मेरे मन!
अमर ज्योति है तेरे सन्सार में
ऐ मेरे मन !










