ऐ मेरे भगवन् !!!

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ऐ मेरे भगवन् !!!

ऐ मेरे भगवन् !!!
तू है जहाँ
कोई ना वहाँ
शक्तिशाली है तू
‘स्वधावान’

तुम तक पहुँचाने आया
अपनी भक्ति को लेकर
निज कृपा से अनुगृहित कर
वरुणेश वरद ईश्वर !
तुम तक पहुँचाने आया

निर्विघ्न कर दो योगक्षेम
कल्याण करो निज प्रेम
पापों से हो मैं उपरत
मिले तुमसे बल की बहु देन
करो धन्य निज शरण से
कल्याण का मार्ग देकर
निज कृपा से अनुगृहित कर
वरुणेश वरद ईश्वर !
तुम तक पहुँचाने आया

उत्तम जीवन अवस्था
स्वस्ति का मार्ग यही है
भक्तों को तुम दिखाते
यह प्रशस्त मार्ग सही है
पाऊँ आदर्श जीवन
तेरी दया को लेकर
निज कृपा से अनुगृहित कर
वरुणेश वरद ईश्वर !
तुम तक पहुँचाने आया

तुम सकल विश्व के हो
अनन्त हे ‘स्वधावान’!
ना लगा सका कोई
सामर्थ का अनुमान
हे अन्नवान कृपालु !
की कृपायें अन्न देकर
निज कृपा से अनुगृहित कर
वरुणेश वरद ईश्वर !
तुम तक पहुँचाने आया

हे वरुण ! बना दो निष्काम
करें प्राणियों का कल्याण
निस्वार्थ कर दो जीवन
परार्थ का हो नित ध्यान
इत उत भटक ना आत्मन्
उठ प्रभु की शरण लेकर
निज कृपा से अनुगृहित कर
वरुणेश वरद ईश्वर !
तुम तक पहुँचाने आया
अपनी भक्ति को लेकर
निज कृपा से अनुगृहित कर
वरुणेश वरद ईश्वर !
तुम तक पहुँचाने आया

ओ३म् अ॒यं सु तुभ्यं॑ वरुण स्वधावो हृ॒दि स्तोम॒ उप॑श्रितश्चिदस्तु ।
शं न॒: क्षेमे॒ शमु॒ योगे॑ नो अस्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒: सदा॑ नः ॥
ऋग्वेद 7/86/8

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई