ऐ मानव ! तू वेद-विहित

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ऐ मानव ! तू वेद-विहित

ऐ मानव ! तू वेद-विहित
मार्ग पर खुद को चला
मित्र बन्धु-बान्धव हर जीव का
करता जा तू भला
ऐ मानव ! तू वेद-विहित है

वेद-ज्ञान, पाशों को काटे
दैविय ज्ञान से करें उद्धार
आssss
उत्तम चाल से चलना सिखाए
सीख के सबको चला
ऐ मानव ! तू वेद-विहित है

वैर-विरोध कुटिलता त्याग दे
ऋजु मार्ग उन्नत अपना ले
आssss
कर चिन्तन सदा परमेश्वर का
पाप जो देता जला
ऐ मानव ! तू वेद-विहित है

जीवन का हर पल है अमोलक
बीत न जाए दुराचरण में
आssss
शुद्ध व्यवहार में शामिल कर ले
साथी शिष्य सखा
ऐ मानव ! तू वेद-विहित
मार्ग पर खुद को चला
मित्र बन्धु-बान्धव हर जीव का
करता जा तू भला
ऐ मानव ! तू वेद-विहित है

ओ३म् अपक्रामन्पौरुषेयाद् वृणानो दैव्यं वचः
प्रणीतीरभ्यावर्तस्व विश्वेभिः सखिभिः सह ||
अथर्ववेद 7/105/1

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई