ऐ मन ! थोड़ा ही ज्ञान है तुझमें ना है तू ज्ञानापन्न
ऐ मन ! थोड़ा ही ज्ञान है तुझमें
ना है तू ज्ञानापन्न
सूर्य नहीं है तू, चाँद के जैसा
तुझमें प्रकाश है कम
तेरा प्रकाश तो अपना नहीं है
क्योंकि आत्मा, सूर्य प्रभु से है दूर
सम्मुख क्यों नहीं हो रहा प्रभु के
सूर्य-प्रभु मार्ग है सम्पन्न
ऐ मन ! थोड़ा ही ज्ञान है तुझमें
ना है तू ज्ञानापन्न
सङ्गति ज्ञानियों की, तू करता जा
उनका नियन्त्रण निज पर ले आ
पाप, दुरित, कलंकों का होगा
विनत हैं ज्ञानीजन
ऐ मन ! थोड़ा ही ज्ञान है तुझमें
ना है तू ज्ञानापन्न
ज्ञानापन्न ज्ञानी तेरी बुद्धि से
दूरितों का जङ्ग देंगे उतार
निर्मल कर देंगे, तेरी प्रज्ञा को
तेज होगा चिन्तन-मनन
ऐ मन ! थोड़ा ही ज्ञान है तुझमें
ना है तू ज्ञानापन्न
सूर्य नहीं है तू, चाँद के जैसा
तुझमें प्रकाश है कम
ऐ मन ! थोड़ा ही ज्ञान है तुझमें
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * ४.४.२०२२ ०७.०७ सायं
राग :- खमाज
गायन समय रात्रि का द्वितीय प्रहर, ताल दादरा ६ मात्रा।
शीर्षक :- पूर्णिमा
वैदिक भजन ८८३ A, भाग १ कल भाग २
*तर्ज :- *
0230-830
शब्दार्थ :-
ज्ञानापन्न = ज्ञान प्राप्त
दुरित = बुराई
विनत = झुका हुआ, विनम्र
प्रज्ञा = समझ, बुद्धि
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
पूर्णिमा
ऐ मेरे मन! तेरा ज्ञान बहुत थोड़ा है। तू जान सकता ही कितना है? तू ज्ञानी नहीं, ज्ञान का पात्र है। तुझमें प्रकाश है पर बहुत कम। तू चांद है, सूर्य नहीं। तेरा प्रकाश अपना नहीं, किसी का है। तू प्रकाश वाले के सम्मुख क्यों नहीं होता? ज्ञानियों की संगति में बैठ। उनका नियंत्रण अपने ऊपर ले। वे तुझे मांज देंगे। कोई कलंक, पाप ताप का कोई लेश तेरी आत्मा पर रहने ना देंगे। तेरी बुद्धि का जंग उतार देंगे। तेरी मनन शक्ति को निर्मल कर देंगे। तेरी प्रज्ञा की धार को तेज कर देंगे। उन्हें क्या करना है? उनके पास बैठने से तू अपने आप मंजता जाएगा।
यह प्रक्रिया एक दिन की नहीं, निरन्तर चलती रहे। तभी तो ज्ञान की खेती लहलहा उठती है। उसमें हरियावल आती है। मन के लिए अन्न पैदा होता है। “मानसिक अन्न अर्थात् ज्ञान”।
मनीषी महानुभावों के नित्य के सत्संग से ही प्रज्ञा में प्रकाश बढ़ता है। द्वितीय के चांद में जितनी अधिक सूर्य की छाया पड़ेगी, उसमें उतनी ही प्रकाश की कला बढ़ती जाएगी। एक दिन आएगा जब उसकी प्रज्ञा की पूर्णिमा होगी।
मेरे मन! तू मनीषी होना चाहता है तो, मनीषियों के हाथ में पड़ जा। यह तुझे ऐसा स्वच्छ करेंगे जैसे गौ बछड़े को।
गौ बछड़े को चूमती है चाटती है अपनी जीभ से उसका संपूर्ण मल हर लेती है। उपदेश- उपदेश में ही इनकी जीभ वह काम कर जाएगी जो गौ की ज़बान बछड़े के शरीर पर करती है।
फिर सब मनीषियों का एक मनीषी तो पूर्ण प्रज्ञ परमेश्वर है। तू उसके सम्मुख हो। उसकी कला से कलावान हो। फिर तेरी ज्ञान- प्रभा के क्या कहने हैं! वास्तविक ज्ञान -भानु वही परमेश्वर है। उसकी छाया में आकर सभी मनीषी पूर्ण मनीषी होते हैं।
कल भाग 2










