अध्यात्म-पथिक बनने के लिये

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अध्यात्म-पथिक बनने के लिये

अध्यात्म-पथिक बनने के लिये,
मन शुद्ध ‘पवित्र’ बने रहना।
व्रत-पालन की सिद्धि के लिये,
मन शुद्ध पवित्र बने रहना ॥

जगदीश पवित्र विशुद्ध सदा,
अपवित्र उसे न पा सकते।
प्रभु का दर्शन पाने के लिये,
मन शुद्ध पवित्र बने रहना।

पापों के कलुषित वातावरण में,
अगर तुम्हें रहना भी पड़े।
पंकज-अंबुज के तुल्य मेरे,
मन शुद्ध पवित्र बने रहना ॥

कुविचार कुचिन्तन के दानव,
यदि अपनी ओर बुलायें तुझे।
सुविवेक-सहारा लेकर के,
मन शुद्ध पवित्र बने रहना ॥

यही है कर्त्तव्य उपासक का,
कि उपास्य के गुण वह ग्रहण करे।
पवमान तेरा भगवान् अतः,
मन शुद्ध पवित्र बने रहना ॥

हे ‘पाल’ समुन्नत जीवन को,
करने की यदि इच्छा है तुम्हें।
दिन रात यही रटते रहना,
मन शुद्ध पवित्र बने रहना ॥