अब तक ऋषि हुए बहुतेरे

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अब तक ऋषि हुए बहुतेरे


अब तक ऋषि हुए बहुतेरे,
दयानंद का सानी ना।
सब कुछ दान किया कितनों ने,
कर्ण सरीका का दानी ना।
निर्मल नीर बहे नदियों में,
गंगा जैसा पानी ना।
रानी हुई बहुत सी अब तक,
सीता जैसी रानी ना।

शाम सवेरे बैठ नदी पर,
नाम ओ३म् का लिये जा।
आय का अपनी सतम् भाग,
नित दीन दुखी को दीये जा।
वैर भाव का त्यागन कर दे,
जब तक जग में जीये जा।
फल की आशा तजकर “धर्मी”,
काम रात दिन किये जा।

प्रथम पति नारि का होता,
सोम वही कहलाता है।
दूजा है गंधर्व पति,
जो उसके मन को भाता है।
तीजा अग्नि पतिदेव है,
तीजी बार सुहाता है।
चौथे से फिर आगे सबका,
नाम मनुष्य ही आता है।

कन्या होय सुशीला ऐसी,
कुल की कान निभावे जो।
मात-पिता घर जब तक हो,
ना श्रृंगार बनावे जो।
सास ससुर को तीर्थ समझे,
उनकी सेवा ठावे जो।
“धर्मवीर”को तज कर ना कभी,
और की ओर लखावे जो।