समीचीनार्स आसते॒ होता॑रः सुप्तामयः ।
प॒दमेक॑स्य॒ पिप्र॑तः॥ ऋः ८.१०.७
तर्जः मूर्तिमन्त भगवन्त भटेला
ज्योति इन्द्रियाँ, इन्द्र देवता॥
भजन
ये जो इन्द्रियाँ हैं करें भला इन्द्रियाँ करें भला॥
॥ये जो॥
कर्मों से आत्मा देहपुरी में आया (2) देह आवास बनाया (2)
जल भोजन वायु के सहारे (2) देह को जीवन मिला।
॥ये जो॥
पाँच इन्द्रियाँ निज कर्मों से (2) आत्म-अभीष्ट है पाता (2)
तत्व सत्यता, उपादेयता (2) है इन्द्रियों की कला॥
॥ये जो॥
समीचीन इन्द्रियाँ सुखद हैं, (2) उलटी हो दुःख लाये (2)
स्वाद, लालसा गर हो सीमित (2) देह का होता भला॥
॥ये जो॥
दायित्व आत्मा का इन्द्रियों पे, (2) प्रियपद जो हैं दिलाते (2)
उत्तम गति से सिद्धि प्राप्त कर (2) बनतीं ज्योतिप्रदा।
॥ये जो॥
आत्मा के लिये देह इन्द्रियाँ (2) आत्मा नहीं उनके लिये।
आत्मा पाये मोक्ष का आनन्द, (2) देह पाये अंतशय्या ॥
॥ये जो॥
(उपादेयता) श्रेष्ठता, उत्तमता, ग्राह्यता। (समीचीन) यथार्थ, ठीक, संगत। (सुखद) सुख
देने वाला। (लालसा) इच्छा। (दायित्व) फर्ज। (प्रियपद) उच्चपद। (ज्योतिप्रदा)
ज्योति देने वाली। (अन्तशय्या) मृत्यु का बिछीना।










