आओ के सुनाये दयानन्द के तरानें ।
आओ के सुनाये दयानन्द के तरानें ।
वो फरिश्ता था, देवता था कोई माने या न माने ।।
मूल शंकर था नाम जिसने व्रत को धारा था ।
देखा शिव रात को उसने अजब नजारा था ।।
एक चूहा जो चढ़ा पिण्ड़ी के ऊपर आकर ।
सोचा वो शिव भी क्या चूहे से आज हारा था ।।
मोरवी गाँव का गुर्जर प्रदेश का वासी ।
चूहे की बात से बस बन गया वो संन्यासी ।।
आओ के सुनाये …..
तू ने भटकी हुई दुनियां को राह दिखाई थी ।
तू ने प्यारी पताका ओ३म की फहराई थी ।।
दिया था वेद ज्ञान सत्य का प्रकाश दिया ।
तू ने दुनियां को एक उत्साह और उल्लास दिया ।।
श्रद्धानन्द, लाजपत, लेखराम हंसराज ।
जगमगाई जिनसे प्यारे तेरी संस्था आर्य समाज ।।
आओ के सुनाये …..










