आओ हम लौटें

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न तं विदाथ य इमा जजानान्यद्युष्माकमन्तरं बभूव ।

नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासतृप उक्थशासश्चरन्ति।।

ऋ. १०.८२.७ यजु. १७/३१

तर्जः मयनी ममतल भार्याभतकलू-राग कलावती

आओ लौटें अंतःकरण में, पावें आत्मा की आत्मा को
ध्यान करें निज अन्तर्मन में।
॥ आओ लौटें ॥

जिसने ये सब भुवन बनाये पर आश्चर्य उसे जान न पाये
पिता है संग फिर क्यों है अन्तर (2) व्याकुल हो क्यों फिरे अकुलन में॥
॥आओ लौटें।

प्रभु सा निकट ना अन्य कोई है (2) आत्मवसु परमात्मा ही है (2)
फिर भी प्रभु क्यों दूर है हमसे (2) क्योंकि लगे हम स्व-तर्पण में॥
॥आओ लौटें।

परदा प्रकृति का है मध्य में, नज़र ना आता पिता सान्निध्य में (2)
तमोगुणी अज्ञान का कोहरा (2) छाया मन के दर्पण में।॥
॥ आओ लौटें।

शब्दाडम्बर आवृत अपना जिसमें (2) जल्पना की है जिसमें कल्पना।
रजोगुणी दूजा ये परदा (2) दूर कराये परमानन्द से।
॥आओ लौटें।

जितनी धुन्ध है उतनी दूरी (2) हुई ना दर्शन-लिप्सा पूरी
असुतृप होकर विचर रहे हैं खान पान में जुटे तन मन से
॥ आओ लौटें।

सूक्ष्म प्राण में रम गई इच्छा (2) इक पूरी दूजे की लिप्सा
जल्पावृत से लोग हैं आवृत (2) अपना राग अलापें जन में।
॥आओ लौटें।

लेखक वक्ता या शास्त्रार्थी (2) शब्द जाल के हैं अभ्यासी
प्रभु का केतन दिखा सके ना, रहते हैं खुद अकेतन में॥
॥ आओ लौटें।

(अकुलन) अभाव, कमी। (जल्पना) निरर्थक शब्दजाल। (स्वतर्पण) खुद की तृप्ति।
(सान्निध्य) समीपता, सामिप्य। (आवृत) फैला हुआ। (शब्दाडम्बर) शब्दों का आडम्बर।
(लिप्सा) अभिलाषा, इच्छा। (असुतृष) प्राण तृप्ति में लगे हुए। (केतन) स्थान, घर। (अकेतन)
बेघर। (जल्पावृत) डींगो से घिरा हुआ।