आज यह पिषाक्त सारा वातावरण है

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आज यह पिषाक्त सारा वातावरण है

आज यह पिषाक्त सारा वातावरण है,
दिशा हीन जीर्ण क्षीण नवीनकरण है,
कैसी है यह कशमकश कांपती दिशायें दस,
रो रहा है आकाश डोलती धरण है ।।1।।

कागजों पे योजना वाणियों में घोषणा,
इससे अधिक आशा वादियों का मरण है।।2।।

चापलूस काम चोर ठौर ठौर चारों ओर,
स्वाभिमानियों के स्वाभिमान का हरण है।।3।।

हो गया नैतिक ह्वास व्यक्ति का व्यक्तित्व उदास,
पाश्विक व्यवहार का यह अन्धा अनुसरण है।।4।।

देखो इक्कीसवी सदी लाये क्या नेकी बदी,
बीसवीं सदी का प्रेमी अन्तिम चरण है।।5।।

रुवाई

आया था सैलानी फिर गया,
वायदा करके जबानी फिर गया,
प्रेमी दिखलायें किसे हम जख्मे दिल,
सारी उम्मीदों पै पानी फिर गया।