आज क्यों आंखें अश्कों में डबडबाई हैं।
आज क्यों आंखें अश्कों
में डबडबाई हैं।
तेरी करनी ही आज
आगे तेरे आई है॥
1. भली बातों में दिल
लगाना तुमने छोड़ दिया।
विषयों में फंसकर भोगों से
नाता जोड़ लिया।
कैसे नादान बना खुद
हैवान बना,
हर तरीके से कमाया
कि जरीमान बना।
बोतल चढ़ा के मस्ती में
आके सारी उम्र गंवाई है….।
2. अपने शुभ कर्म से इंसान
संभल सकता है।
अपनी तकदीर से
तकदीर बदल सकता है।
तमसो मा ज्योतिर्गमय
वेद के पथ गहे,
तभी पा सकता है
‘राकेश’ तू मृत्यु से अभय।
कविता तुम्हारी सरिता से
प्यारी सबकी पसन्द आई है….।
3. सोच ले अपने लिए
कितने घर उजाड़े हैं।
जीभ के स्वाद में
निर्दोष पशु मारे हैं।
सोचता खुद का भला
काटता उनका गला,
ममता की बाहों में
वो भी तो पला।
अपने पिसर की लपटें
जिगर की ममता तुझे समाई है….।










