आज देश को नया रूप दो नूतन प्राण भरो।
आज देश को नया
रूप दो नूतन प्राण भरो।
सब निज स्वार्थ भुलाकर अपना
हरजन का कल्याण करो॥
जहां हिमालय से गंगा की
पावन धारा बहती हों।
जहां पर कपिल कणाद
जैमनी की संताने रहती हो॥
बिलख-बिलख कर वहां भूख से
पीड़ित जनता कहती हों।
हमें बचालो भूख से कोई
अन्न का दान करो ॥1॥
धुला नहीं क्या बोलो
अब तक पराधीनता पाप है।
कुन्दन स्वर कानों से सुनो
हर कोई क्यों चुपचाप है॥
स्वतन्त्रता में भूख से मरना क्यों
ये नहीं अभिशाप है।
आग लगेगी आंसूओं से
मत बहरे कान करो॥2॥
नई-योजना के चम्मच से
सूखे अधर लुभाये जाते।
बड़े-बड़े कुछ बोध बांधकर
बड़े पेट ही खाये जाते॥
सुविधाओं का सुखद प्रलोभन
देकर टैक्स लगाये जाते।
वायदों का पाखण्ड तोड़कर
अब पूरा अरमान करो॥3॥
आशा की पलकों पर कितनी
वार ही बन्धनवार सजाई।
लेकिन अरमानों की दुल्हन
अभी तलक ना द्वार पै आई॥
पूनम के चन्दा के बदले
रजनी टूटे तारे लाई।
स्वयं सुखों में डूबे दुखी के
दुख का भी अनुमान करो ॥4॥
स्यार सिंह की खाल ओढ़कर
अधिक समय ना छलपायेगा।
धन धरती के गरूर वाला कुर्सी पर
ना अब जायेगा॥
‘कर्मठ’ सावधान हो जाओ
वर्ना समय ऐसा आयेगा।
दुर्योधन पारथ के
बाणों की पहिचान करो॥5॥










