आज अगर खामोश रहे तो कल सन्नाटा छायेगा।
आज अगर खामोश रहे तो
कल सन्नाटा छायेगा।
आग लगे जब हर बस्ती
में याद दयानन्द आयेगा॥ टेक ॥
सन्नाटे के पीछे से तब
आयेगी यहां एक सदा।
यहां नहीं कोई, यहां नहीं
कोई भी इस घर में है बचा॥
सजा सजाया जहां धदकती
लपटों में फंस जायेगा॥1॥
कलियों की महक खिलते
फूलों की झुलस जायेंगी पंखड़ियाँ।
लगती हैं नजदीक पशुता के
ताण्डव की अब घड़ियां ॥
लड़ियां खुशी की टूटें अन्धेरा
उजाले को धमकायेगा॥2॥
वक्त की कीमत समझो निकलजा
मुट्ठी से मखमल की तरह बसते
नगर घर गांव उजड़ कभी बन
जायें जंगल की तरह दुल्हन
की तरह सजते रहे तो कल
क्या इतिहास बतायेगा॥3॥
आज सन्देशा वेदों का
उम्मीद की किरण दीखता है।
वरना तो सामने आँखों के
गृहयुद्ध का लक्षण दीखता है॥
निर्भीकता मिटजायेगी यहां
भय का आतंक ही छायेगा ॥4॥
भारत क्या पूरे ही विश्व के
बचने का यही मार्ग है आज
वैदिक सभ्यता संस्कृति का
जो बिगुल बजादे आर्य समाज
राज समझ वेदों का कर्मठ
जन-जन सुख पायेगा॥5॥










