क्या-क्या लोगों की इच्छा, क्या-क्या कामनाएँ

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क्या-क्या लोगों की इच्छा, क्या-क्या कामनाएँ

क्या-क्या लोगों की इच्छा
क्या-क्या कामनाएँ
हम तो केवल प्रभु तुमसे
आनन्द चाहें

सुमना रहें निरन्तर
प्रसन्न रहें नर-नारी
रहें दूर अज्ञानों से
बनें सदा परोपकारी
नवज्योति पाते रहें
चुने सत्य-राहें
हम तो केवल प्रभु तुमसे
आनन्द चाहें

उत्तरोत्तर सूर्य समचार
ज्ञान उदित होवे
सानन्द हृदय हमारा
हृदयहारी होवे
इससे अधिक ऐश्वर्य
और हम क्या चाहें
हम तो केवल प्रभु तुमसे
आनन्द चाहें

देवाधिपति सुदेव
सर्वगुण दायक
दिव्य गुण प्राप्त कराओ
परम सहायक
हर समय प्रसन्नमना हम
बने और बनाएँ
हम तो केवल प्रभु तुमसे
आनन्द चाहें

क्या-क्या लोगों की इच्छा
क्या-क्या कामनाएँ
हम तो केवल प्रभु तुमसे
आनन्द चाहें

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * २३.७.२००२ ३.०० मध्यान्ह

राग :- जोग
गायन समय रात का द्वितीय प्रहर, ताल कहरवा ८ मात्रा

शीर्षक :- सदा प्रसन्न रहें
वैदिक भजन ८९६ वां

*तर्ज :- *
838-0239

शब्दार्थ :-
सुमना = अच्छे मन वाला
सानन्द = आनन्द पूर्वक
समचर = समान आचरण वाला

प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇

सदा प्रसन्न रहें

लोग न जाने क्या-क्या इच्छाएं करते हैं पर हम तो केवल इतना चाहते हैं कि हम सदा प्रसन्न रहें आनन्दित रहें। हर समय सुमना रहें। हमारा आनन्द कहीं अज्ञान का आनन्द या विपरीत प्रकार का आनन्द ना हो,इसलिए इतना और चाहते हैं कि हम निरन्तर नवप्रकाश को पाते रहें,सूर्य के उदय को सदा देखते रहे़, ज्ञानोदय को उत्तरोउत्तर उपलब्ध करते रहें। इस प्रकार उत्तरोत्तर ज्ञान- प्रकाश में उन्नत होते हुए हम अधिकाधिक उत्तम आनन्द से आनन्दित रहें, प्रसन्न बने रहें।बस, वसुओं के वसुपति से, संपूर्ण ऐश्वर्यों के अधिश्वर से हम और कुछ नहीं चाहते।उसके अनन्त ऐश्वर्य भंडार से हम केवल यही प्राप्त करना चाहते हैं, इसे ही हम सर्वोत्कृष्ट ऐश्वर्य समझते हैं। हम जानते हैं कि हमारे प्रभु देवों के देव हैं संपूर्ण देवों को वहन करने वाले हैं संपूर्ण दिव्य गुणों को प्राप्त कराने वाले हैं और यह प्रभु हमारी दौड़कर रक्षा करने वाले हैं आड़े समय पर भक्तों की रक्षा के लिए तुरन्त अपनी रक्षा सहित पहुंचने वाले हैं। हम चाहते हैं कि रक्षा के साथ आने वाले यह हमारे वसुपति प्रभु दिव्य गुणों को प्राप्त कराते हुए हम पर ऐसे ही कृपा करें कि हम उनके सूर्य- प्रकाश में विकसित होते हुए सदा आनन्दित रहें,हर समय प्रसन्न बने रहें। बस हमें और कुछ नहीं चाहिए और कुछ नहीं चाहिए।
🎧896 वां वैदिक भजन🕉️👏🏽🧎🏽‍♂️