भय से रहित है उस का जीवन, जिस योगी के ऐसे कुटुम्ब जन

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भय से रहित है उस का जीवन

भय से रहित है उस का जीवन
जिस योगी के ऐसे कुटुम्ब जन

धैर्य पिता है, क्षमा है मैया
गगन है ओढ़न, भूमि शैया
ज्ञान का अमृत जिसका भोजन
भय से रहित है उस का जीवन
जिस योगी के ऐसे कुटुम्ब जन

शान्ति जिसकी जीवन संगिनी
रूप दया है जिसकी भगिनी
मित्र है जिसका सत्य सनातन
भय से रहित है उस का जीवन
जिस योगी के ऐसे कुटुम्ब जन

जिसका भाई मन का संयम
ज्ञान ध्यान का जिसमें संगम
वस्त्र दिशाओं के करता धारण
भय से रहित है उस का जीवन
जिस योगी के ऐसे कुटुम्ब जन

भय से रहित है उस का जीवन
जिस योगी के ऐसे कुटुम्ब जन

इस भजन की तुलना संस्कृत के प्रसिद्ध निम्न श्लोक से कीजिये :–
धैर्य यस्य पिता क्षमा च जननी शान्ति: चिरं गेहिनी
सत्यं सूनु: अयं दया च भगिनी भ्राता मन:संयम: |
शय्या भूमितलं दिश: अपि वसनं ज्ञानामृतं भोजनम्
एते यस्य कुटुम्बिन: वद् सखे कस्माद् भयं योगिन: ||
भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक
भावार्थ – धैर्य जिसका पिता है, क्षमा जिसकी माता है, लम्बे काल तक साथ देने वाली शान्ति जिसकी स्त्री है, सत्य जिसका मित्र है, दया जिसकी बहिन है, मन का संयम जिसका भाई है, भूमि ही जिसकी शय्या है, दिशाएं ही जिसके वस्त्र हैं और ज्ञान रूपी अमृत का पान करना ही जिसका भोजन है, हे मित्र ! जिस योगी के ऐसे कुटुम्बीजन हैं, उसे संसार में किससे भय होगा ? अर्थात् किसी से भी भय नहीं होगा।