जो जन जाने कर्म भोग को, फिर भी शोक मनाता है।

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जो जन जाने कर्म भोग को, फिर भी शोक मनाता है।

जो जन जाने कर्म भोग को,
फिर भी शोक मनाता है।
जो जन जाने नरक स्वर्ग को,
फिर भी पाप कमाता है।
जो जन जाने परम पिता को,
फिर भी हंसी उड़ाता है।
“धर्मी”ऐसा जन ही जग में,
महा मूंढ कहलाता है।

जो जन जाने मोक्षधाम को,
फिर भी यत्न नहीं करता।
जो जन जाने पाप पुण्य को,
फिर भी झूंठ से ना डरता।
जो जन जाने दया धर्म को,
फिर भी दुखड़ा ना हरता।
“धर्मी”ऐसा मूंढ मनुष्य ही,
नरक कुंड का दुख भरता।

जो जन मान करे औरों का,
मान जगत में पता है।
जो जन धर्म में धन देता है,
दूना द्रव्य कमाता है।
जो जन सेवा करे पूज्य की,
मोक्ष धाम को जाता है।
जो जन द्वेष करे
ना”धर्मी”,
गीत खुशी के गाता है।

“धर्मी”सुखी नहीं रहता,
झूठे की मित्रताई से।
“धर्मी”रोग नहीं मिटता,
मूरख की दई दवाई से।
“धर्मी”मान नहीं मिलता,
अधरम की करी कमाई से।
“धर्मी”जग में ना बसता,
लड़ता जो भाई-भाई से