काम करो जग के सारे परमन में ओ३म् ही ध्याओ

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काम करो जग के सारे पर मन में ओ३म् ही ध्याओ

काम करो जग के सारे पर
मन में ओ३म् ही ध्याओ
बन्धु !!! निशदिन ओ३म् ओ३म् ही गाओ
निशदिन ओ३म् ओ३म् ही गाओ

ओ३म् है नाम प्रभु का प्यारा,
ओ३म् से महका है जग सारा।
ओ३म् है माता, पिता, गुरु,
ओ३म् ही सच्चा सखा, सहारा।
ओ३म् को जानो, ओ३म् को मानो,
ओ३म् में चित्त लगाओ।
बन्धु !!! निशदिन ओ३म् ओ३म् ही गाओ
निशदिन ओ३म् ओ३म् ही गाओ

ओ३म् को ध्याकर काम करोगे,
निश्चित उसमें सफल रहोगे।
रोग, शोक, भय मिट जायेंगे,
सबके प्यारे बन जाओगे।
यश, धन, बल सब मिल जाएगा,
दिल में ओ३म् बसाओ।
बन्धु !!! निशदिन ओ३म् ओ३म् ही गाओ
निशदिन ओ३म् ओ३म् ही गाओ

ओ३म् का जपना,
ओ३म् का भजना,
सीधे-सीधे प्रभु से मिलना।
ओ३म् है गहना, जिसने पहना,
उसके जीवन का क्या कहना!
इसीलिए कहता है “रूप” प्रिय,
ओ३म् को ना बिसराओ।
बन्धु !!! निशदिन ओ३म् ओ३म् ही गाओ
निशदिन ओ३म् ओ३म् ही गाओ

काम करो जग के सारे पर,
मन में ओ३म् ही ध्याओ।
बन्धु !!! निशदिन ओ३म् ओ३म् ही गाओ
निशदिन ओ३म् ओ३म् ही ध्याओ
निशदिन ओ३म् ओ३म् ही ध्याओ

रचनाकार व स्वर :- आचार्य संजीव रूप जी , सरस-सरल वेदकथाकार, पुरोहित, कवि, संस्थापक / संचालक – आर्य संस्कारशाला,आर्य समाज गुधनी, यज्ञतीर्थ – गुधनी – बदायूँ (उत्तर प्रदेश) सम्पर्क सूत्र :- 9997386782 9870989072

1) यजुर्वेद 40/15 में कहा है “ओ३म् क्रतो स्मर” अर्थात् ओ३म् का स्मरण-चिन्तन करना चाहिए |
2) यजुर्वेद 2/13 में कहा है “ओ३म् प्रतिष्ठ” अर्थात् ओ३म् की स्थापना कीजिये |
3) यजुर्वेद 40/17 में कहा है “ओ३म् खं ब्रह्म” अर्थात् ओ३म् आकाश के तुल्य व्यापक ब्रह्म=बड़ा बताया है |
4) ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत (छान्दोग्योपनिषद् 1/4/1) = “ओ३म्” यह अक्षर उद्गीथ है, इसकी उपासना करनी चाहिये।
5) ओमित्येकाक्षरम् ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन | यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्। गीता 8/13
जो पुरुष “ओ३म्” इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ, स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।।