कुछ पल की जिन्दगानी, एक रोज सबको जाना।

0
56

कुछ पल की जिन्दगानी, एक रोज सबको जाना।

कुछ पल की जिन्दगानी,
एक रोज सबको जाना।
वर्षों की तू क्यों सोचे,
पल का नहीं ठिकाना।
मल-मल के तूने अपने,
तन को जो है निखारा।
इत्रों की खुशबुओं से,
महके शरीर सारा।
काया न साथ जानी,
ये बात न भुलाना।।
कुछ पल की जिन्दगानी, एक रोज…..

मन है हरि का दर्पण,
मन में इसे बसा ले।
करके तू कर्म अच्छे,
कुछ पुण्य धन कमा ले।
कर दान और धर्म तू,
रब को अगर है पाना।।
कुछ पल की जिन्दगानी, एक रोज……

आएगी वो घड़ी जब,
कोई न साथ होगा।
कर्मों का तेरे सारे,
एक एक हिसाब होगा।
ये सोच ले अभी तू,
ये वक्त फिर न आना।।
कुछ पल की जिन्दगानी, एक रोज……

कोई नहीं है तेरा,
क्यों करता है मेरा मेरा
खुल जाए नींद जब भी,
समझो वहीं सवेरा।
हर भोर की किरण संग,
हरि का भजन तू गाना।।
कुछ पल की जिन्दगानी, एक रोज……