भगवान तुम्हारे दर पे, भक्त आन खड़े हैं।

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आस्था

भगवान तुम्हारे दर पे, भक्त आन खड़े हैं।
संसार के बन्धन से परेशान खड़े हैं।

ओ मालिक मेरे! ओ मालिक मेरे …….

संसार के निराले, कलाकार तुम्हीं हो।
सब जीव जन्तुओं के, सृजनहार तुम्हीं हो।
तुझ परम प्रभु का मन में, लिए ध्यान खड़े हैं।।
संसार के बधन से परेशान खड़े हैं….

ओ मालिक मेरे! ओ मालिक मेरे ……

तुम वेद ज्ञान दाता, पिताओं के पिता हो।
वह राज कौन सा है, जो आपसे छिपा हो।
हम तो हैं अनाड़ी बालक, बिना ज्ञान खड़े हैं।।
संसार के बंधन से परेशान खड़े हैं….

ओ मालिक मेरे! ओ मालिक मेरे …….

सुनकर विनय हमारी, स्वीकार करोगे।
मझधार में है नैया, प्रभो पार करोगे।
हर कदम कदम पर आगे, ये तूफान खड़े हैं।।
संसार के बंधन से परेशान खड़े हैं….

ओ मालिक मेरे ! ओ मालिक मेरे …….

दुनियाँ में आप जैसा, कोई और नहीं है।
इस ठौर के बराबर, कहीं ठौर नहीं है।
अपनी तो ‘पथिक’ मन्जिल है, जो पहचान खड़े हैं।।
संसार के बंधन से परेशान खड़े हैं….

ओ मालिक मेरे! ओ मालिक मेरे……