कौन कहता आर्य जन
कौन कहता आर्य जन कुछ भी न कर दिखला रहे।
आज ऋषिवर की बताई, राह पर सब आ रहे ।।
मूर्ति पूजा को जिन्होंने स्वर्ग की सीढ़ी कहा।
आज देखो स्वयं इसकी हानियाँ बतला रहे। 1।
ईश का अवतार होता धर्म रक्षा के लिए।
अब अनेकों ईश्वरों से भक्त जन घबड़ा रहे। 2।
शूद्र की छाया पड़ी तो मानते खण्डित हुए।
आज देखो होटलों में साथ भोजन खा रहे। 3।
श्राद्ध, मृतक भोज में जो पोप मस्ती छानते ।
आज घर बैठे विचारें, रो रहे पछता रहे। 4।
नारियों को नीच कहकर जो न पढ़ने भेजते ।
आज वह ही लड़कियों को वेद तक पढ़वा रहे। 5।
बालकों के ब्याह करने से न आते बाज जो।
आज अपनी भूल को स्वीकार करते जा रहे। 6।
ब्याह विध्वा का कहें थे धर्म के विपरीत है।
आज इसको धर्म के अनुकूल खुद समझा रहे। 7।
काम जितने भी जहाँ में हो रहे उत्थान के।
है दयानन्द की दया ‘नरदेव’ सब यों गा रहे ।। 8 ।।
























