धर्म कर्म मत छोड़ो रे मनवा।

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धर्म कर्म मत छोड़ो

(तर्ज – झनक झनक मोरी बाजे पायलिया)

धर्म कर्म मत छोड़ो रे मनवा।
प्रीत की रीत न तोड़ो रे मनवा।

जिस ने तुझे इनसान बनाया।
धन दे दे कर धनवान बनाया।
पीठ किये क्यों दूर खड़ा है
उसकी तरफ़ मुख मोड़ो रे मनवा ।
धर्म कर्म मत छोड़ो रे मनवा ।

दीन दुःखी से प्यार किये जा।
जन जन पर उपकार किये जा।
फिर तुझ को सुख शान्ति मिलेगी
लग्न प्रभु संग जोड़ो रे
धर्म कर्म मत छोड़ो रे मनवा ।

मानव तन अनमोल रतन है।
ऋषि मुनियों का सत्य वचन है।
थोड़े में ही ज्यादा समझो
बात का सार निचोड़ो रे मनवा।
धर्म कर्म मत छोड़ो रे मनवा ।

काम क्रोध मद मोह कथायें।
मन्जिल से अति दूर हटायें।
झूठे पथ को ‘पथिक’ त्याग कर
सत्य की राह में दौड़ो रे मनवा।
धर्म कर्म मत छोड़ो रे मनवा।