त्रैतवाद सिद्धान्त
(तर्ज-बुरा जो देखन में चला)
१. इस सारे संसार में मूल तत्त्व हैं तीन।
ब्रह्म जीव और प्रकृति वेद वचन प्राचीन।
रे मानव वेद वचन प्राचीन।
२. ये तीनों संसार में अलग अलग हैं तत्त्व।
नित्य अनादि अनन्त हैं इन का बहुत महत्त्व ।
रे मानव इन का बहुत महत्त्व।
३. सर्वशक्तिमय ब्रह्म है परम सच्चिदानन्द ।
सकल ज्ञान भण्डार है पावन करुणाकन्द।
रे मानव पावन करुणाकन्द।
४. ब्रह्म अखण्ड असीम है कभी न होय विभक्त।
भूत भविष्यत् आज में रहे एक हर वक्त।
रे मानव रहे एक हर वक्त।
५० जन्म मरण के फेर में ब्रह्म कभी न आये।
यह प्रपञ्च है जीव का जन्म मरण फल पाये।
रे मानव जन्म मरण फल पाये।
६. ब्रह्म सर्व व्यापक सदा है आनन्द स्वरूप।
ग जीव एक देशी रहे सहे छांव और धूप।
रे मानव सहे छांव और धूप।
७. सुख दुःख इच्छा द्वेषमय अरु प्रयत्न और ज्ञान।
छः लक्षण हैं जीव के न्याय शास्त्र फ़रमान ।
रे मानव न्याय शास्त्र फ़रमान ।
८. शस्त्र काट सकते नहीं इसे न आग जलाये।
जल में गल सकता नहीं हवा न जीव सुखाये।
रे मानव हवा न जीव सुखाये।
९. ब्रह्म जीव को एक ही कहते हैं जो लोग।
सही अर्थ नहीं जानते तथ्य नहीं उपयोग।
रे मानव तथ्य नहीं उपयोग।
१०. तीनों कालों में सदा नित्य नियम हैं दोय।
ब्रह्म जीव बनता नहीं जीव ब्रह्म नहीं होय।
रे मानव जीव ब्रह्म नहीं होय।
११-सत्व रजस तम एक सम जो परमाणु रूप।
यही अचेतन तत्त्व है प्रकृति नाम अनूप।
रे मानव प्रकृति नाम अनूप।
१२. सकल जगत् इससे बना अद्भुत विशद विशाल ।
ओर छोर जिसका नहीं करो जाँच पड़ताल।
रे मानव करो जाँच पड़ताल।
१३. ब्रह्म जीव चेतन सदा प्रकृति जड़ बेजान।
इन तीनों के मेल से चले जगत् अभियान।
रे मानव चले जगत् अभियान।
१४. त्रैतवाद सिद्धान्त का वेद करें उल्लेख।
‘पथिक’ पाठ कर वेद का त्रैतवाद को देख।
रे मानव त्रैतवाद को देख।










