जिधर देखता हूँ मैं नज़रें उठाकर
(तर्ज – हुजूर आते आते बहुत देर कर दी)
जिधर देखता हूँ मैं नज़रें उठाकर
कुदरती नज़ारे उधर देखता हूँ।
इधर तो प्रभु तेरी कारीगरी है
कि जलवे तुम्हारे उधर देखता हूँ।
जिधर देखता हूँ मैं नज़रें उठाकर…
१. तुझे ढूँढ़ने हर तरफ़ लोग जायें।
न धरती न अम्बर न छोड़ी दिशायें।
मगर जिस घड़ी मैं जिधर चाहता हूँ
तुझे मेरे प्यारे उधर देखता हूँ।
जिधर देखता हूँ मैं नज़रें उठाकर……
२. बड़े सख़्त हैं आपदाओं के घेरे।
हुए जब घने ज़िन्दगी में अन्धेरे ।
निराशा की काली घटाओं के पीछे
चमकते सितारे उधर देखता हूँ।
जिधर देखता हूँ मैं नज़रें उठाकर…
३. भँवर के थपेड़ों ने धर धर के मारा।
मिला जिस समय एक तेरा सहारा।
मुझे अपने दिल से लगाने की ख़ातिर
तड़पते किनारे उधर देखता हूँ।
जिधर देखता हूँ मैं नज़रें उठाकर….
४. सभी वाणियाँ गायें महिमा तुम्हारी।
मनुज देव दानव हैं तेरे पुजारी।
जिधर भी करे कोई गुणगान तेरा
‘पथिक’ स्वर्ग सारे उधर देखता हूँ।
जिधर देखता हूँ मैं नज़रें उठाकर……










