भगवान् तुम्हारे दर पे भक्त आन खड़े हैं।
(तर्ज – करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं स्वीकार करो माँ)
- भगवान् तुम्हारे दर पे भक्त आन खड़े हैं।
संसार के बन्धन से परेशान खड़े हैं।
ओ मालिक मेरे ! ओ मालिक मेरे…..
१. संसार से निराले कलाकार तुम्हीं हो।
सब जीव जन्तुओं के सृजनहार तुम्हीं हो।
तुझ परम प्रभु का मन में लिए ध्यान खड़े हैं।
संसार के बन्धन से परेशान…..
ओ मालिक मेरे…..
२. तुम वेद ज्ञान दाता पिताओं के पिता हो।
वह राज़ कौन सा है कि जो आपसे छिपा हो।
हम तो हैं अनाड़ी बालक बिना ज्ञान खड़े हैं।
संसार के बन्धन से परेशान…..
ओ मालिक मेरे…..
३. सुनकर विनय हमारी स्वीकार करोगे।
मंझधार में है नैया प्रभो पार करोगे।
४. हर कदम कदम पर आगे ये तूफ़ान खड़े हैं।
संसार के बन्धन से परेशान…..
ओ मालिक मेरे…..
४. दुनियाँ में आप जैसा कोई और नहीं है।
इस ठौर के बराबर कहीं ठौर नहीं है।
५. अपनी तो ‘पथिक’ मन्जिल है जो पहचान खड़े हैं।
संसार के बन्धन से परेशान…..
ओ मालिक मेरे…..










