दिव्य आचमन

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१ २ ३२३ १२३१ २ ३१२ २उ ३ १२ शं

नो देवीरभिष्टये शं नो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः ॥ यजु. ३६/१२

तर्जः माविन चोटिले मळमुळले मधुर माय

माहिन आनन्दन परब्रह्म परमेश्वर, सुख सौभाग्य प्रदाता
परमानन्द सरस रस दायक, भय भञ्जन सुखदाता
शिवमंगल कारक, दिव्य-गुणोध आदि-व्याधि-शामक, हे सुबोध !
सुख-शान्ति की तुमसे है अभिलाषा॥
॥ माहिन॥

कण कण निवासक, कल्याणकारी
परमपिता परमात्मा
सर्व आत्माओं की हो, आत्मा
सतत् प्रवाहित स्त्रोत तुम्हारा, जो सुख-सौभाग्य लाता
और शुद्ध प्रबुद्ध बनाता
उपर की ओर उठकर
जाते हैं प्रभु की ओर
तुम बिन ना कोई दूजा
जो सुख-शान्ति का ठोर
सुख शान्ति की तुझसे है अभिलाषा…
॥ माहिन॥

धारणा ध्यान समाधि से करते
साक्षात्कार प्रभु का
दृत दिव्य प्रभु है अनूठा
आत्म विभोर हो जाते ऐसे, सुख-शान्ति देती ऋजुता
पा जाते आनन्द की वर्षा, उसे दिवस-रात्री पूजें
करें ध्यान नित उसी का
होने लगेगा यूँ फिर, अनुभव वितत विभु
का सुख शान्ति की तुझसे है अभिलाषा
॥ माहिन॥

(विभु) सर्वव्यापक। (माहिन) पूजनीय। (गुणोय) गुणों का समूह। (सुबोध) उत्तम
ज्ञानयुक्त। (दृत) आदरणीय। (ऋजुता) सरलता।