इन्द्रो यातोऽवसितस्य राजा शमस्य च शृङ्गिणो वज्रवाहुः ।
सेदु राजा क्षयति चर्षणीनामरान्न नेमिः परि ता बभूवः ॥ ऋः १.३२.१५
तर्जः मारा घट मा विराजता श्रीनाथ-215
मैं अपने इन्द्र प्रभु का क्या वर्णन करूँ, शम्भुजी, महाप्रभुजी
मेरी वाणी नीरस, जिसमें शब्द ना कथन
टूटे फूटे शब्दों में गुनगुना रहा है मन, मेरे प्राण जीवन, ॥ मैं अपने॥
कुछ तो चाहूँ मैं मन की पूरी साध कर लूँ (2)
जड़ व चेतन-राजा का अभिवाद कर लूँ (2)
मेरा तनमन है तुझपे वारी वारी भगवन् रहूँ तुझमें में मगन ॥
॥मैं अपने ॥
सूर्य चन्द्र तारों का नियामक है, वन पर्वत सागर का विधायक है
मानव पक्षी पशु का करे पालन, सबको तेरी लगन॥ ॥ मैं अपने॥
दुष्ट पापी उच्छृंखल के वज्रबाहु, संत ज्ञानी गुणवान तेरे याचिष्णु
कर्मफल के नियम भी बनाये तू ही। जो ना बदलें इक क्षण॥ ॥मैं अपने ॥
कृषिकर्ता मानवों का राजाधिराज है
मनोभूमि में उसके बीजों का प्रसाद है
अन्तःकरण या धरती ईश्वर से याज्य है
जिसमें करे मन उद्वर्धन ॥
॥मैं अपने ॥
रथ के चक्र में जैसे ये आरे लगे
वैसे इन्द्र भी परिधी में व्याप्त रहे
वस्तुओं में सामञ्जस भी वो ही रखे
विश्व-चक्र का-चलन॥
॥मैं अपने ॥
इन्द्र राजराजेश्वर के गायें सब गीत आओ
बन जायें प्रभु के चरण-चंचरीक करें
गुञ्जन स्तुतियों का, मंडराये-प्रीत करें तेरा भजन
॥ मैं अपने ॥
(अभिवाद) वन्दना। (नियामक) नियंत्रण करने वाला। (विधायक) विस्थापक। (याविष्णु)
याचनाशील। (याज्य) यज्ञ सम्बन्धि । (उच्छृंखल) उदंड। (उद्धर्थन) वृद्धि। (परिधि) घेरा।
(सामञ्जस) संगति। (चंचरिक) मंडराने वाला भींरा।










