उषाओं के आगे चमकने वाला राजा

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श्रीणामुदारो धरुणो रयीणां मनीषाणां प्रार्पणः सोमगोपाः ।

वसुः सूनु सहसो अप्सु राजा वि भात्यग्र उषसामिधानः ॥ ऋ. १०.४५.५

तर्जः मळविल्लिन नरगिन्दे मुखमुन्नु काणा

आओ हम अग्निदेव प्रभु राजा की शरण में जाकर पा लें चमक
प्रभु देता है अपने साधक को त्रिवृत् शोभा श्री यश अकत
सारे ऐश्वर्यों का एकमात्र स्वामी वो देता मनुष्यों को धन यश सम्पद्॥
आध्यात्मिक मानसिक और शारीरिक शोभाओं को वो निखारे सतत् ॥
॥ आओ हम ॥

कुसंगति ईर्ष्या द्वेष में मानव की, सम्पत्तियाँ जब बिखरने लगे
उस वक्त जागरुक करता है ईश्वर ही, और मार्ग दिखाता उसको सुगत।
॥आओ हम ॥

मानव की भौतिक सम्पत्तियों को धृत रखने में बनता प्रभु ही निमित्त
। अभीप्सा मनीषा प्रतिभा बुद्धियों का ईश्वर केवल है प्रकष्ट रक्षक।
॥आओ हम ॥

उजड़े हुओं को बसाने वाला है वो, और जो बसा उसे करता है दृढ़
‘सूनुसहस्’ का है, साहस मनोबल का है अग्निदेव दाता बृहत् ॥
॥आओ हम ॥

प्रतिदिन उदित होती चमकीली उषाएँ क्या उनकी शक्ति है स्वयं
प्रदत्त द्योतक है इनका अग्नि स्वरूप परमेश्वर, हर उषा के आगे चलता सहज
॥ आओ हम ॥

पर्जन्य-जलमें जो विद्युत है विद्योतित उस जल में द्युति जल की अपनी नहीं
वो द्युति तो है अद्भुत परमेश्वर की जिसमें परमात्माग्नि चमके भरसक ।
॥आओ हम ॥

क्या सूर्य क्या चाँद क्या तारे क्या विद्युत प्रभु की तनिक ज्योति लेकर चमकें
आओ विद्युत उषाओं के अग्निरूप द्योत राजा से पायें चमक अक्षत।
॥आओ हम ॥

(त्रिवृत्) तिगुना (आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक)। (सुगत) अच्छी तरह जाने वाला।
(धृत) स्थिर रहने वाला। (निमित्त) उद्देश्य। (अभीप्सा) इच्छा। (प्रकष्ट) प्रवल। (सोमगोपा)
सौम्यता आदि गुणों का रक्षक। (उपगत) प्राप्त। (सूनुः) बल का पुत्र। (योतक) प्रकाशक
। (युति) चमक। (पर्जन्य) बादल, मेघ। (भरसक) यथाशक्ति। (योत) प्रकाश रखने वाला।
(अक्षत) नाश न होने वाला।