स्तुता मया वरदा वेदमाता प्र चोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्
आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्ति द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्। मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् । अथर्व. १६.७१.१
तर्जः मळयुल्ल रात्री मानसिन्द तू वरिल
मैंने वेदमाता की स्तुति की हृदय से, और शुभ चिन्तन किया है,
विदुर वेदमाता के ज्ञान के उपदेशों से सार्थक जीवन जिया है।
॥ मैंने वेदमाता॥
वेदमाता का स्तवन अध्ययन अर्थ-चिन्तन और गान करें
जीवन का उसे अंग बनाकर अमृत रस का पान करें
है वेदमाता गायत्री, गायें उसे दिवस व रात्री
परमेश्वर रूप कवि का गायन है हृदयवासी
हर इक द्विज को जिसने पावन किया है॥
॥ मैंने वेदमाता ॥
सानिसा सानिसा सानिसा सानीसा रे,
सानि सा सानिसा सानिसा सानीसा रे,
सानीरेसानी, गरेसानी॥
सुनना है सुन लो, ज्ञानियों का अनुभव,
वेद-स्तवन-से दीर्घायु सम्भव
दीर्घ जीवन में प्राणवान बनके
पाई प्रजाएँ सुयोग्य और अनवर
पशुपालन की शिक्षा दी, मन्त्रों ने यश कीर्ति दी
हुई पूजित धन प्राप्ति, ब्रह्मतेज की आत्मिक शान्ति
बस निश्चित समझ लो सब कुछ दिया है।॥ ॥ मैंने वेदमाता ॥
विद्या की देवी सरस्वती मात ने, करा दी हृदयंगम विविध विद्यायें।
आत्मलोक में हुईं प्रतिष्ठित, ऐश्वर्य निधियों की बहा दी धााराएँ।
बनी आत्म-अङ्ग वो मेरी, किरणें निखरीं सुनहरी,
माँ की वाणी है स्नेही और मुझे बनाया सेवी
वेदमाता ने हृदयों में घर कर लिया है।
॥ मैंने वेदमाता ॥
(विदुर) बुद्धिमान। (अकत) संपूर्ण । (अनवर) श्रेष्ठ, उत्तम। (पूजितघन) सेवा से प्राप्त धन।
(द्विज) जिसका दो बार जन्म हो, ब्राह्मण। (हृदयंगम) आत्मसात करना। (स्तवन) स्तुति करना।
(प्रतिष्ठित) आदर प्राप्त, विख्यात। (घर करना) समा जाना। (सेबी) सेवा करने वाला।










