त्रिविध महान ऐश्वर्य

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प्र मंहिष्ठाय वृहते ब्रहद्रये सत्य सुष्माय तवसे मतिं भरे।

अपामिव प्रवणे यस्ये दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावृतम्

॥ ऋ. १.५७.१ अथ २०/१५/१

तर्जः मळयिल निरयुम पुडपोले.

मेरा मन तेरे गुण क्या तोले
चरणों में आया हूँ तोरे
तू तो परम दानी है प्रभु
दे ऐश्वर्य तेरे मोहे॥
मेरा मन…

हे बल वाले तू बल दे अद्भुत जिससे आत्मा की शक्ति बड़े
तेरे गुणों के आकर्षण से मुझको सुख समृद्धि मिले
वाह भगवन्! तू है कितना करुण बह रहा ऐश्वर्य तेरे कारण
बेरोक टोक नदिया जैसा बह रहा ऐश्वयों का धन॥
मेरा मन…

काल अनन्त से कृपा बरसाये बहते ऐश्वर्य का अन्त नहीं
छूट खुली है कोई भी ले ले, तुझसा कोई दयावन्त नहीं
तुझ महादानी के ऐश्वयों के आगे तो कुछ भी नहीं
प्रेम श्रद्धा भक्ति जहाँ पाई, तेरे चरण भी मिले वहीं।
॥मेरे मन ॥