पाप के छः कारण

0
6

न स स्वो दक्षों वरुण ध्रुतिः मा सुरां मन्युवि॒िभीको अर्चित्तिः ।

अस्ति ज्यायान् कनीयस उफ्रे स्वप्न॑श्च॒नेदनृतस्य प्रयो॒ता।

ऋ. ७.८६.६

तर्जः प्रिया आज आले

प्रभु मेरे हृदय में समा जा
प्रेम से हूँ गद्गद दर्श प्यासा
प्रकाशित है तेरी प्रतिभा
जग सारा तेरी कविता
मेरे पाप के छः कारण, करते रहते हैं दुःखी (2)
चाहिये मुझे तेरा बल जिसकी मुझमें है कमी (2)
अनन्य गुणों का पय पिला, मार्ग प्रशस्त ही दिखा… होड 55
॥ प्रभु मेरे !!

आदतें बुरे कामों की मिटा दे मेरे प्रभुवर (2)
ध्रुति छोड़ आत्म निरिक्षण करा देना सत्वर (2)
पाप से हे नाथ! दे बचा, मन में करे ना घर व्यथा ॥ होऽ ऽ5
॥ प्रभु मेरे॥

मूल पाप का है अचित्ति, अज्ञान मन का बढ़ाये (2)
परिणाम हानिकारक जीवन को सताये (2)
प्रभु मेरे ज्ञान को बढ़ा, वस्तुस्थिति सच्ची समझा ॥ होऽ ऽ ऽ
॥ प्रभु मेरे ॥

निद्रा में सोया हुआ मन भी अलसाये (2)
स्वप्न की तरह ये संचित ज्ञान मुरझाये (2)
सतर्क-निपुणता को प्रभा देता है आलस को दबा॥ होऽ ऽ ऽ
॥ प्रभु मेरे ॥

क्रोध से विचार की शक्ति देती है दगा (2)
क्रोध क्रोधी को कर देता मन से अन्धा (2)
ईर्ष्या शोक लोभ का बँधा, क्रोधी रहता पापों से सटा ॥ होड 55
॥ प्रभु मेरे ॥

सुरा का शराबी मादकता में ही बौराये (2)
गाँजा भाँग तमाखू खाकर बौधिक स्तर गिराये (2)
बुद्धि नाश करती है सुरा, मादक द्रव्य है बुरा॥ होऽ ऽ ऽ
॥ प्रभु मेरे ॥

विभिदक-कमाई देती पाप को जगा (2)
जुए के पासों ने दिए कई घर डुबा
दूजे की कमाई का ठगा धन, पाप को देता बढ़ा॥ ॥ होऽ ऽ ऽ
॥ प्रभु मेरे ॥

(श्रुति) बुरे कामों की आदत। (सत्वर) तुरन्त। (अचित्ति) नासमझी। (संचित) प्राप्ति,
इकट्ठा करना। (विभिदक) जुआ।