तेरी इच्छा

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अभ्रातृव्यो अ॒ना त्वमनापिरिन्द्र जनुपा॑ स॒नाव॑सि ।

युधेवा॑प॒त्वम॑च्छसे ॥ ऋ. ८.२१.१३ अथ. २०.११४.१

तर्जः प्रिय सखी ऐविड़िनी-प्रणयिनी

(राग-तिलक कामोद)

अधिपति अनुभवी
प्रिय प्रभो! अति सुधी !
हो तुम सनातन परमानन्द
बन्धुरहित प्रतिनिधी
अनवधि हो 555
नेता नियन्ता सतत् से
हो इन्द्र रक्षक जगत के
सबके, प्रीतम, इन्द्रेश ! इन्द्रेश !
अधिपति….

सा ऽ ऽ रेसा नीसा रेगमप धप मगरे
रेग मप रेऽ परे मऽऽ गमग मऽ रे सा नी सा

ना तेरा है कोई बन्धु, ना ही शत्रु कोय
फिर भी हम बन्धुत्व तेरा ना कभी भी खोय
हो प्रभु निर्लिप्त फिर भी, चाहते हो बन्धुत्व
लड़ता जो बन्धुत्व-युद्ध बनता वो ही प्रवण ॥
अधिपति….

रोग दुःख दरिद्र पीड़ा सतत् उत्पन्न होय
समझ में आने लगा है, यही पाप को धोय
उलझनों कठिनाईयों को भी पार करके हम
करें तेरे इस बन्धुत्व का पूर्ण रसास्वादन
इस तरह तेरा प्रेम पाकर पायें परमानन्द
अधिपति…

जो भी आज है दूर तुझसे, या तेरा द्वेषी
युद्ध करे बन्धुत्व का यदि वो बन सकता ऋषि
कमर कस के खड़ा हूँ पाना है प्रभु तेरा संग
जितनी बार जन्म मैं लूँगा रहूँगा तेरा बन
प्रार्थना हैं ‘इन्द्र’ तुझसे जानो मेरी तड़पन

(प्रणव) उदार, विनीत। (निर्लिप्त) जो किसी भी विषय में लिप्त न हो। (अनवधि) असीम।