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सुपर्णोऽसि गरुत्मान् पृष्ठे पृथिव्याः सीद।

भासाऽन्तरिक्षमा पृण ज्योतिषा दिवमुत्तभान तेजसा दिश उद्दृश्हे

॥ यजु. १७/२

तर्ज : प्रियनी कुरन्नी इल्ली, विरूदे विरन्नी अल्ली

हे जीव ! तू जाने ना खुद को, तू सुपर्ण है गरुत्मान है
तेरी उड़ान है अति सुन्दर, तेरा द्युः तलक उत्थान है

उन्नति हेतु लिया है जन्म तुझमें युक्त हैं शुभ लक्षण
आत्मा तेरी है सदा गुरु गौरव युक्त हैं तेरे प्राण
हे जीव !…

पुरुष है तू सम्पूर्ण धरा का, उठ जा तू भूतल पे बैठ
अन्तरिक्ष को निज दीप्ति से, आत्म ज्योति से कर दे लैस
हे जीव !…

सत्पुरुषों का है द्युलोक ये, जिनकी दिव्यता है तुझमें
आत्म ज्योति से दिव्य ज्योति को तू चमका निज तेजस् से
हे जीव !…

तेरी साधना और तेजस्विता हो विस्तारित दिग्दिगन्त
लेते हुए हर मानव को संग उन्हें कर दे दृढ़ उत्तंग
हे जीव !…

तू अग्नि है पूर्ण प्रदीप्त है अपनी चमक सबमें चमका
तू सुपर्ण है गरुत्मान है बन राजा तू प्रजा को उठा।
हे जीव !…

(सुपर्ण) अच्छे या समर्थ पंखों वाला। (अनवधि) असीम। (उत्तंग) बहुत ऊँचा। (गरुत्मान)
गुरु आत्मा वाला।