न ते वर्तास्ति राधेस इन्द्र दे॒वो न मर्त्यः। यद्दित्ससि स्तुतो मघम् ॥14॥ट. ८.१४.४
तर्जः प्रियन मात्रम न्यान तरुम मधुर मे प्रणयम
रख के सम्मुख लक्ष्य को करता हूँ पुरुषार्थ
कभी तो होता सफल कभी, विफल करते स्वार्थ
कभी बिन प्रयास हूँ सफल
जी तोड़ के भी कभी विफल
रख के…
कारण जब सोचता हूँ तब ही मैं खोजता हूँ
ईश्वर विश्वास की है बात
जिनको मिलती नहीं है पूर्ण सफलताएँ, आती हैं जीवन में तनातनी घात
जब कर्म के संग, ईश-विश्वास की सुगन्ध
आ आ के मिलती है, मन-कली खिलती है
मिलता ही जाता सब यथार्थ ॥
रख के…
हे इन्द्र ! जब तुम्हारी, हृदय से स्तुति करता, करता हूँ तेरा ही स्मरण
आध्यात्मिक या भौतिक ऐश्वर्यों की प्राप्ति, तेरे विश्वास में हूँ प्रपन्न
तुम कैसे रुक सकते हो, दान के लिए उत्सुक हो
क्षणभर में चल पड़ते हो, देने को अभिष्टों
को तुममें है प्रभु पूर्ण निस्वार्थ॥
रख के…
जब तुम अपने स्तोता को देने को आ जाते हो,
खुल जाते हैं उसके भाग्य
तब कोई कितना भी रोके, या फिर वो बाधा डाले,
उसका ना टूटे प्रभु विश्वास
ना ही राज्याधिकारी, ना ही प्राण इन्द्रियाँ सारी
उन्मार्गगामी हो कर, ना मार सकती ठोकर
क्योंकि प्रशस्त है प्रभु मार्ग ॥
रख के…
ईश्वर का सच्चा साधक, समय भी ना उसका बाधक
मिलतीं उपलब्धियाँ बड़ी बड़ी
अल्प समय में उसको, प्रेम भरा परमेश्वर देता बिन माँगे यश रयि
हे हृदय मन्दिर के देव! श्रद्धाप्रापक एकमेव
श्रद्धा है तुम पे अविचल, कर दो पुरुषार्थ सफल
तेरे चरणों में रख दिया एकार्थ॥
रख के…
(प्रपन्न) शरणगत। (अभीष्ट) चाहा हुआ। (उन्मार्गगामी) बुरा मार्ग, कुपथ। (प्रशस्त)
प्रशंसनीय, अतिश्रेष्ठ। (एकार्थ) एक ही अर्थ का।










