जीवन की रात में जिसे तू आ मिले

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आरे अस्मदमतिमारे अंह आरे विश्वां दुर्मतिं यन्निपासि ।

दोषा शिवः सहसः सूनो अग्ने यं देव आ चित् सचसे स्वस्ति ।

ऋ. ४.११.६

तर्ज : पोयवरुवान कूड़े वरू पोरमगळे

हे करुणाकर! हे भगवन् ! सद्बुद्धि वर्द्धक आनन्दधन।
पाप-प्रवाह से हमें बचा लो और दिखा दो अपनापन !
॥हे करुणाकर॥

पाप-प्रवाह में, आत्मा से इन्द्रियाँ, विद्रोही बन जाती हैं
आत्मा के वश, ना वो रहतीं, विचल विमुख हो जाती हैं।
॥हे करुणाकर॥

घोरान्धकारक, आसुरी लोक में, मरकर पापी आते हैं।
आत्मघाती को नये जन्मों में, पाप अन्धकार सताते हैं।
॥हे करुणाकर॥

जागते जब, सत्कर्म मनुष्य के, तब तुम मिलने आते हो हे
महाबल, प्रियवर अग्ने! सोये भाग्य जगाते हो।
॥हे करुणाकर॥

घोर सन्नाटा रात्री में छाए, ध्यान में आपके हो जाएँ
हमें अकेला भटका समझकर, आप मिलन में खो जाएँ।॥
॥हे करुणाकर॥

नास्तिकता फिर कैसे रहेगी और मन में संदेह कहाँ?
प्रेम विनय श्रद्धा के समर्पित संग खड़े हैं देव यहाँ।
॥हे करुणाकर॥

अब ना अनास्था, ना ही अश्रद्धा पङ्क पाप का फिर है कहाँ?
आने ना देना फिर से अमति को, ना तुम्हें दूँ मैं गवाँ॥
॥हे करुणाकर॥

साम म प ध प ध प म
प ऽ नी ध प ऽग साप प ध प म।

(विचल) अस्थिर। (विमुख) विपरीत, निराश। (विद्रोही) द्वेषी, उपद्रवी। (अनास्था)
भक्तिहीनता। (अमति) असम्मति। (पङ्क) कीचड़ ।