कुछ बून्दें हम पर भी बरसा दो

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मध्वः सूदं पवस्व वस्व उत्सं वीरं च न आ पवस्वा भगं च।

स्वदस्वेन्द्राय पर्वमान इन्दो रयिं च न आ पवस्वा समुद्रात् ॥ ऋ. ६.६७.४४

तर्जः पुन्निनो मल्लादे येन्दिनो तून्दियो रिष्टम

अमृत छलका दे प्यासा हूँ कब से भगवन्
(देखो) हो रहा नीरस तनमन
हे सर्वेश्वर! हे पवमान परमात्मन्
हे सुख कारक दुःख भञ्जन॥ अमृत…

हे करुणामय! प्रीतिदाय !
क्या मैं नहीं हूँ तेरा प्राणाय्य
कर दो आनन्दित आनन्दन् ।
दुःखियों के करुणाकन्द
हे इन्दु !
कर दो मधु वर्षण
मधुमय भगवन्॥ अमृत…

चखूँ जहाँ से वहीं से हो मीठे
फिर क्यूँ प्रभु तुम रूठे?
अपने ही जैसा मीठा बना दो,
हे वसुमान ! वसु के
प्राण हमारे कर दो नियंत्रित
बनें वसिष्ठ ऋषि सम
करो स्वीकार समर्पण अमृत…

हे प्रभु! वीर रसों के वसुधन
वीर रसों से भरो मन
फिर षड्रिपु तो होंगे पलायित
होंगे न उनके दर्शन
कर दो प्रदान सौभाग्य भी हमको
हृदय बना दो सरलतम
जागें भाव अहिंसन॥ अमृत…

हे सोमदेव आकर्ष जगाओ
रसना करे तेरा स्वादन
ऐसा चिर चस्का लग जाए
छूट ना जाए आकर्षण
तेरे ऐश्वर्य के सागर से
पा लें कुछ बूँदें हम
बन जाएँ, तेरे भाजन। अमृत…

(पवमान) पूर्ण पवित्र (प्रणाय्य) प्रेम करने वाला, चाहने वाला (वसु) अग्नि। (षड्रिपू)

छः शत्रु (पलायित) भागा हुआ। (आकर्ष) खिंचाव। (भाजन) पात्र, योग्य।