हमारी पुकार

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आ वा॑ गम॒द्यदि॒ि श्रव॑त्सहस्रिणीभिरुतिर्भिः । वाज॑भि॒रूप॑ नो॒ हव॑म् ।।

一ऋ. १.३०.८ अथ. २०.२६.२ – साम. ७४५

तर्जः पण्ढ़री नाथा थड़करी आशा

जगत विधाता, प्रभु सुखदाता (२)
जब सुन लेता तड़प हृदय की,
पास अधिक हो जाता (झट से) (२)
॥ जगत॥

उस तक अपनी करना सुनाई, ये प्रयत्न तो बड़ा कठिन है, (2)
चाहिये बल सामर्थ्य योग्यता और न आत्मा जिसकी मलिन है,
सच्चे भक्तों की वो सुनता, मन जिनका सन्देह रहित है,
व्यर्थ न जाये हृदयी प्रार्थना, शुद्धात्मा ही प्रभु को पाता ॥ ॥ जगत॥

अज्ञानान्धकार की ठोकर, पग पग पर अज्ञानी खाते (2)
ज्ञान प्रकाश के महापुञ्ज से (२) ये त्रिलोक, प्रभु ही चमकाते
बिना कान सब ओर से सुनते यदि कल्याणमय प्रार्थना पाते,
प्रभु पुकार जब सुनता है तब सर्वात्मभाव से हृद् भर जाता ॥ ॥ जगत॥

रक्षा शक्तियाँ अगणित उसकी अनन्त सेना रक्षा करती (2)
हमें तो बस चाहिये जरा सी (२) ‘वाज’ की शक्ति उस प्रभुवर की
पवित्र हृदय से जो भी पुकारे हृदय-वाज शक्ति घर करती
हम पीड़ितों की रक्षा करता अबलों का वो ही बलदाता॥ ॥ जगत॥

आत्मा में हो स्वार्थ शून्यता, भाव समर्पित, हृद-पावनता (2)
दिव्य विभूति भरी फौज से (२) हम मत्यों का बनता बलदा
नेत्रहीन बनकर जब जीते, मार्ग दिखाता प्रभु, प्रकाश का
ज्ञान-मेघ निर्झर तब बरसे, निर्भय हो जीते बिन बाधा॥ ॥ जगत ॥

(मलिन) मैला, दूषित, (वाज) ज्ञान व बल, (पवित) निर्मल शुद्ध, (अबल) बलहीन,
कमजोर (पुञ्ज) समूह, देर। (अगणित) जो गिनी न जा सके, (विभूति) ऐश्वर्य, (मत्य)
मरण धर्मा, (हृद) हदय।