चितचोर का चमत्कार

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इन्द्रमच्छ सुता इमे वृषणं यन्तु हरयः ।
श्रुष्टे जातास इन्दवः स्वर्विदः ॥
साम ५६६, ५७४ क्र.७.१०६.१ (७.१०६.१)

तर्जः निला विंडी तूखल तुडुन्न बोले

प्रभु की कृपाएँ आनन्द घोलें
हैं ज्योतियाँ उसकी जो साथ होलें (2) हे हे ऽSS
अनुभूतियाँ रस की निःशब्द बनकर के
आत्मा को अमृत पिला के डोले
ना जाने काया पलट कब होले ? ॥ प्रभु की…

मानो अचानक स्वर्ग आध्यात्मिक
मिल गया इस शुष्क जीवन में
आनन्द अलौकिक आत्मा की तृप्ति का
देता है शान्ति ही भीतर से
इस सोम रस के आगे सब रस हैं फीके
ऐसे सरस रस को काहे छोड़े? ॥ प्रभु की…

बालक को थकते हुए देख माताही
छाती से उसको लगाए स्वयं
ऐसे ही बल लगता भक्तों के सवनों में
ईश-कृपा का होता है वर्षण
ये सोम का सोता बह उठने का होता
ये सोम ही अन्तर्पट को खोले ॥ प्रभु की…

इन्द्र के पास था ऐश्वर्य अज्ञात
और थी विभूति जो थी तिरोहित
अभ्यास, वैराग्य से, लगे उठने
आत्मा के आवरण अनवस्थित
ये धर्म स्वरूप ‘वृषा’ बना आत्मा
बदली दिशाएँ अब हौले हीले ॥ प्रभु की…

पहले तो आत्मा का पात्र था कच्चा, यज्ञ की आग में पकता रहा

झोली युगों से जो खाली थी अब तक, ईश-कृपा उसमें भरता रहा
रत्न ही रत्न हुए दृष्टिगोचर, भर दिए प्रभु ने रत्नों से झोले

सवन यज्ञस्थान, तिरोहित छिपा हुआ, अन्तर्हित, वृषा=बरसने वाला, अनवस्थित चञ्चल, अशांत