सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव
निराकार न्यायकारिन्
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
सर्वजगत् उत्पादक आधार
हे निरंजन निर्विकार
सनातन सर्वानन्दप्रद
सर्वशक्तिमान हे अज !
अद्वितीयानुपम अधमोद्धारक
हे जगदीश !! जगदादिकारण !
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
अविद्या-अन्धकार-निर्मूलक
विद्यार्थ-प्रकाशक परमसहायक
हे नरेश परमेश्वर्यदायक!
अधमोद्धारक साम्राज्यप्रसारक
करुणाकर अस्मितपित:
सकल-दु:खविनाशक पावन
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
विश्वविलासक परमसुखदायक
निरुपद्रव दारिद्र विनाशक
निर्मल निरीह निरामय
सुनीतिवर्धक प्रीतिसाधक
विश्वविनोदक दीनदयाकर
नायक शर्मद दुष्टताड़न
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
विश्वप्रकाशक विश्वसहायक
सत्यगुणाकार सत्योपदेशक
हे सिद्धिप्रद सज्जनसुखद
हे ज्ञानप्रद रोगविनाशक
पुरुषार्थप्रापक दुर्गुणनाशक
परेश परमेश हे सुखावन् !
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
राज्य विधायक शत्रु विनाशक
सर्वबल दायक निर्बल पालक
सुधर्म सुप्रापक अर्थसुधारक
धर्म सुशिक्षक संतति पालक
मोक्षप्रद सर्वान्तर्यामी
निर्वैरविधायक पतितपावन
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव
निराकार न्यायकारिन्
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
भाग 2
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव
निराकार न्यायकारिन्
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
गर्वकुक्रोध कुलोभविदारक
जगदानन्दक सर्वव्यापक
विश्वाद्य परमात्मन् परब्रह्म
सूक्ष्माच्छेद्य जगतादिकारण
मान्यप्रद विनयविधिप्रद
सुकामवर्धक क्रतु मनभावन
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
अजरामृतामय निर्बन्धनादे
विद्वद्विलासक मङ्गलप्रसादे
महाविद्या वाचोधिपते
महिमावान महामनीषे
स्वीकरणीय परेश्वर परमेश्वर
सत्यसुखदायक धर्मन्यायकारिन्
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
इत्याद्यनन्त विशेषणवाच्य
सर्वोत्कृष्ट अप्रतिमप्रभाव
हे निश्चित मित्र वरुण !
सत्यसुखद परमोत्तम
हे अर्यमा ! न्याययुक्त
पराक्रमेश्वर राजाधिराजन्
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
हे बृहस्पते! हे अंगीकृत!
हे विष्णो! हे सर्वव्यापक !
शीघ्र दीजिए स्थिर सुख
हे दु:खनाशक !! हर लो दु:ख
आए शरण तेरे सुपुत्र
दु:ख-दुरित का करो निवारण
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
दो समृद्धि सुख अनन्त
हे दयालु !! सोमवन्त
ले लो हमको अपने अङ्क
न्यायकारिन् दयावन्त
हे अनादि !! मित्र वरुण !
हे सुखदायक! दो सुख-सावन
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव
निराकार न्यायकारिन्
सच्चिदानन्द अनन्त स्वरूप
ओ३म् शं नो॑ मि॒त्र: शं वरु॑ण॒: शं नो॑ भवत्वर्य॒मा ।
शं न॒ इन्द्रो॒ बृह॒स्पति॒: शं नो॒ विष्णु॑रुरुक्र॒मः ।। ९ ।।
यजुर्वेद 36/9
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई










