सतसंग वाली नगरी चल रे मना
“सतसंग वाली नगरी चल रे मना २
पी सत ज्ञान का जल रे मना २
सतसंग वाली नगरी…२
१.
इस नगरी में ज्ञान की गंगा २
जो भी नहाए हो जाए चंगा
मल मल हो निर्मल
रे मना सतसंग वाली नगरी…२
२.
सतसंग के हैं अजब नजारे २
बहुत सुहाने बहुत ही प्यारे
पा सुख शांति का फल
रे मना सतसंग वाली नगरी…२
३.
सतसंग का ये असर हुआ है २
बाहर सब कुछ बदल गया है
अंदर से तू बदल
रे मना सतसंग वाली नगरी…२
४.
सतसंग का वो फल है निराला २
मन मन्दिर में होवे उजाला
कर जीवन को सफल
रे मना सतसंग वाली नगरी…२
५.
किस्मत का चमका है सितारा २
उदय हुआ है भाग्य तुम्हारा
अवसर जाए ना निकल
रे मना सतसंग वाली नगरी…२
६.
चल के पथिक शुभ कर्म कमा ले २
इस अवसर से लाभ उठा ले
देर न कर इक पल
रे मना सतसंग वाली नगरी…२
पी सत ज्ञान का जल
रे मना २ सतसंग वाली नगरी…२
स्वर एवं रचना – सत्यपाल पथिक
(वैदिक भजनोपदेशक)”










