रात अन्धेरी है, बादल हैं

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रात अन्धेरी है, बादल हैं

रात अन्धेरी है, बादल हैं, विकट जंगल है
रात अन्धेरी है, बादल हैं, विकट जंगल है
क्या है चिन्ता, यह आत्म-बल हमारा सम्बल है
माघ के घोर शीत से बचा वो गरने को
उसको कम्बल की जरूरत है, जिसमें कम बल है

टिका कर हाथ कानों पर
टिका कर हाथ कानों पर
करो कोशिश दबाने की
तुम्हें आवाज आयेगी
प्रभु के कारखाने की
टिका कर हाथ कानों पर

सदा दिन-रात चलती हैं,
मशीने कौन सी अन्दर,
सदा दिन-रात चलती हैं,
मशीने कौन सी अन्दर
उबलने की, रगड़ने की
उबलने की, रगड़ने की
ध्वनि पिसने-पिसाने की
तुम्हें आवाज आयेगी
प्रभु के कारखाने की
टिका कर हाथ कानों पर

न गेहूँ में, न चावल में,
न सब्जी में, न दालों में,
न गेहूँ में, न चावल में,
न सब्जी में, न दालों में,
बदन में खून बनता है,
विधि क्या है बनाने की
तुम्हें आवाज आयेगी
प्रभु के कारखाने की
टिका कर हाथ कानों पर
करो कोशिश दबाने की
तुम्हें आवाज आयेगी

लहू से, माँस-मज्जा से,
बने हड्डियों के ढ़ांचे पर,
पलस्तर साफ चमड़ी का,
कला देखो सजाने की
तुम्हें आवाज आयेगी
प्रभु के कारखाने की
टिका कर हाथ कानों पर

प्रभु के कारखाने में
नसों का जाल फैला है
प्रभु के कारखाने में
नसों का जाल फैला है
नसों का जाल फैला है
करोड़ों नाड़ियाँ इसमें
करोड़ों नाड़ियाँ इसमें
नहीं ताकत गिनाने की
तुम्हें आवाज आयेगी
प्रभु के कारखाने की
टिका कर हाथ कानों पर

जो बढ़िया माल बनता है
इसी में खर्च होता है
जो बढ़िया माल बनता है
इसी में खर्च होता है
मगर मल-मूत्र को बाहर
मगर मल-मूत्र को बाहर
व्यवस्था है गिराने की
तुम्हें आवाज आयेगी
प्रभु के कारखाने की
टिका कर हाथ कानों पर

“पथिक” प्राणों के चलने से
यहाँ सब काम चलते हैं
“पथिक” प्राणों के चलने से
यहाँ सब काम चलते हैं
यहाँ सब काम चलते हैं
प्रभु के हाँथ में शक्ति
प्रभु के हाँथ में शक्ति
है प्राणों के चलाने की
तुम्हें आवाज आयेगी
प्रभु के कारखाने की
टिका कर हाथ कानों पर
करो कोशिश दबाने की
तुम्हें आवाज आयेगी
प्रभु के कारखाने की
टिका कर हाथ कानों पर
करो कोशिश दबाने की

रचनाकार :- पण्डित सत्यपाल जी “पथिक”
स्वर :- श्री कल्याण सिंह जी वेदी