तुम्हारे दिव्य-दर्शन की
तुम्हारे दिव्य-दर्शन की,
मैं इच्छा ले के आया हूँ
पिला दो प्रेम का अमृत,
पिपासा ले के आया हूँ
रतन अनमोल लाने वाले,
लाते भेंट को तेरी
मैं केवल आँसुओं की मञ्जुमाला,
ले के आया हूँ
जगत के रङ्ग सब झूठे,
तू अपने रङ्ग में रङ्ग दे
मैं अपना यह महा-बदरङ्ग बाना,
ले के आया हूँ
“प्रकाश” आनन्द हो जाये,
मेरी अन्धेरी कुटिया में
तुम्हारा आसरा विश्वास,
आशा ले के आया हूँ
रचनाकार :- आर्य कवि पूज्य प्रकाश वीर जी शास्त्री










