ब्रह्मन् ! स्वराष्ट्र में हों
ब्रह्मन्!!! स्वराष्ट्र में हों,
द्विज ब्रह्म तेजधारी
क्षत्रिय महारथी हों,
अरिदल विनाशकारी
ब्रह्मन्!!! स्वराष्ट्र में हों,
द्विज ब्रह्म तेजधारी
होवें दुधारू गौएँ,
पशु अश्व आशुवाही
आधार राष्ट्र की हों,
नारी सुभग सदा ही
ब्रह्मन्!!! स्वराष्ट्र में हों,
द्विज ब्रह्म तेजधारी
बलवान सभ्य योद्धा,
यजमान पुत्र होवें
इच्छानुसार वर्षें,
पर्जन्य ताप धोवें
ब्रह्मन्!!! स्वराष्ट्र में हों,
द्विज ब्रह्म तेजधारी
फल-फूल से लदी हों,
औषध अमोघ सारी
हों योग-क्षेमकारी,
स्वाधीनता हमारी
ब्रह्मन्!!! स्वराष्ट्र में हों,
द्विज ब्रह्म तेजधारी
स्वर :- पूज्य ब्रह्मचारी श्री अरुण कुमार जी आर्यवीर
प्रस्तुत भजन निम्न मन्त्र का पद्य-भाव-अनुवाद है :–
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शूर॑ इष॒व्योऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्री॑ धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्ति॒: पुर॑न्धि॒र्योषा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॑यतां॒ निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यो॑ वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ ओष॑धयः पच्यन्तां योगक्षे॒मो न॑: कल्पताम् ।। २२ ।।
यजुर्वेद 22/22










