ओ३म् जिह्वाया अग्रे मधु मे

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ओ३म् जिह्वाया अग्रे मधु मे

ओ३म् जिह्वाया अग्रे मधु मे
ओ३म् जिह्वाया अग्रे मधु मे
मेरी वाणी में मिठास हो
मेरी वाणी में मिठास हो
जिह्वामूले मधूलकम्
जिह्वामूले मधूलकम्
मन इन्द्रियों का न दास हो

वाणी के अग्र भाग में
रहे मूल में भी मधु रस भरा
वाणी के अग्र भाग में
रहे मूल में भी मधु रस भरा
जीवन के सारे कर्मों में
साक्षी मेरा रहे प्रभु सदा
हो चरित्र में भी पवित्रता
हो चरित्र में भी पवित्रता
मन में न कोई प्यास हो
मन में न कोई प्यास हो
ओ३म् जिह्वाया अग्रे मधु मे

ममेदह क्रतावसो
हे नाथ ! प्राणों में तुम बसे
ममेदह क्रतावसो
हे नाथ ! प्राणों में तुम बसे
व्यापक तुम्हीं हो विश्व में
आत्मा मेरी ये ही कहे
सबका भला चाहूँ सदा
सबका भला चाहूँ सदा
सारे दुर्गुणों का विनाश हो
सारे दुर्गुणों का विनाश हो
ओ३म् जिह्वाया अग्रे मधु मे

मम चित्तम् हो, दर्शन तेरा
प्यारा लगे, बन्धन तेरा
मम चित्तम् हो, दर्शन तेरा
प्यारा लगे, बन्धन तेरा
आलस्य भी पा करते हों
तुमको प्रभु वन्दन मेरा
उपायसि दिल में मेरे
उपायसि दिल में मेरे
प्रभु जी ! तेरा ही वास हो
प्रभु जी ! तेरा ही वास हो
ओ३म् जिह्वाया अग्रे मधु मे
मेरी वाणी में मिठास हो
मेरी वाणी में मिठास हो
जिह्वामूले मधूलकम्
जिह्वामूले मधूलकम्
मन इन्द्रियों का न दास हो
मन इन्द्रियों का न दास हो

स्वर :- पूज्या श्रीमती मिथिलेश जी शास्त्री

ओ३म् जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम्
ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि

अथर्ववेद 1/34/2